छत्तीसगढ़
बिलासपुर में ‘नक्शा घोटाला’ का महाविस्फोट, फर्जी आर्किटेक्ट के नाम पर सैकड़ों मंजूरियां
Shantanu Roy
15 March 2026 8:13 PM IST

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छग
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में शहरी विकास और निर्माण स्वीकृतियों से जुड़ा एक बड़ा कथित घोटाला सामने आया है, जिसने नगर निगम और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (TCP) विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दस्तावेजों की जांच में सामने आया है कि एक ही प्रोजेक्ट में फ्लैटों की संख्या और मंजिलों को लेकर भारी विसंगति है। इतना ही नहीं, शहर में सैकड़ों निर्माण स्वीकृतियां एक ऐसे कथित आर्किटेक्ट के नाम पर जारी की गईं, जिसका वास्तविक अस्तित्व ही संदिग्ध बताया जा रहा है। यह पूरा मामला बिलासपुर के अज्ञया नगर क्षेत्र में प्रस्तावित ‘मेसर्स अनंत रियाल्टी’ प्रोजेक्ट से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है।
आरोप है कि इस प्रोजेक्ट के माध्यम से बिल्डर नमन गोयल ने विभागीय अधिकारियों की कथित मिलीभगत से मास्टर प्लान और निर्माण नियमों को दरकिनार कर विकास अनुज्ञा हासिल की। दस्तावेजों के अनुसार इस प्रोजेक्ट के लिए प्रस्तुत एरिया स्टेटमेंट में केवल चार मंजिलों पर 60 फ्लैट बनाने का प्रस्ताव दिया गया था। लेकिन विभाग द्वारा स्वीकृत नक्शे में फ्लैटों की संख्या बढ़ाकर 90 और मंजिलों की संख्या छह दर्शाई गई है। निर्माण नियमों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि एरिया स्टेटमेंट और स्वीकृत नक्शे के बीच इतना बड़ा अंतर सामान्य प्रशासनिक त्रुटि नहीं हो सकता। यह विसंगति इतनी स्पष्ट है कि किसी भी स्तर पर जांच होने पर तुरंत सामने आ सकती थी। इसके बावजूद ऐसा नक्शा स्वीकृत होना पूरे अनुमोदन तंत्र की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
फर्जी आर्किटेक्ट के नाम पर मंजूरियां
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू उस आर्किटेक्ट का नाम है जिसके माध्यम से यह नक्शा तैयार किया गया। दस्तावेजों में ‘विकास सिंह’ नाम दर्ज है, लेकिन बिलासपुर शहर में इस नाम का कोई पंजीकृत आर्किटेक्ट या इंजीनियर उपलब्ध नहीं है। नगर निगम और संबंधित पेशेवर संस्थाओं के रिकॉर्ड के अनुसार इस नाम का कोई व्यक्ति आधिकारिक रूप से वास्तुकार या इंजीनियर के रूप में पंजीकृत नहीं है। जांच में यह भी सामने आया है कि इसी नाम का उपयोग पहले भी कई परियोजनाओं के नक्शे स्वीकृत कराने में किया गया था। बाद में जब इस पर संदेह हुआ तो नगर निगम ने इस नाम से जुड़े लाइसेंस को निलंबित कर दिया था। इसके बावजूद उसी नाम से एक बड़े प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल जाना विभागीय निगरानी प्रणाली पर सवाल उठाता है।
अवैध निर्माण में भी सामने आया नाम
हाल ही में नगर निगम द्वारा पुराने बस स्टैंड के पास स्थित महुआ होटल पर अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की गई थी। 13 मई को निगम की टीम ने होटल परिसर में बुलडोजर चलाकर अवैध निर्माण को हटाया था। जब इस होटल से संबंधित दस्तावेजों की जांच की गई तो पता चला कि उसका नक्शा भी ‘विकास सिंह’ नामक कथित आर्किटेक्ट के नाम से स्वीकृत किया गया था। जांच में यह भी पाया गया कि होटल निर्माण के दौरान स्वीकृत नक्शे की कई शर्तों का उल्लंघन किया गया था। ओपन स्पेस और पार्किंग जैसी अनिवार्य व्यवस्थाओं को नजरअंदाज कर निर्माण कर लिया गया था। इसके बाद 24 जुलाई 2025 को नगर निगम ने ‘विकास सिंह’ नाम से जुड़े लाइसेंस को ब्लैकलिस्ट कर दिया। जब इस मामले में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्ट्स से जानकारी मांगी गई तो उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके रिकॉर्ड में इस नाम का कोई पंजीकृत आर्किटेक्ट मौजूद नहीं है।
400 नक्शे और 150 लेआउट की मंजूरी
जांच के दौरान विभागीय फाइलों की पड़ताल में एक और बड़ा खुलासा हुआ। पता चला कि शहर में इसी कथित आर्किटेक्ट के नाम से 400 से अधिक भवनों के नक्शे और 150 से ज्यादा लेआउट स्वीकृत किए जा चुके हैं। यह तथ्य सामने आने के बाद यह आशंका और गहरा गई है कि कहीं यह पूरा मामला एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा तो नहीं था, जिसके माध्यम से निर्माण स्वीकृतियों का बड़ा खेल चलाया जा रहा था।
EWS आवास को लेकर भी गड़बड़ी
इस प्रोजेक्ट में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आवास से जुड़ी गंभीर अनियमितता का आरोप भी सामने आया है। नियमों के अनुसार बड़े आवासीय प्रोजेक्ट में गरीब वर्ग के लिए फ्लैट आरक्षित करना अनिवार्य होता है। बिल्डर द्वारा विभाग को दिए गए शपथपत्र में दावा किया गया था कि ग्राम तिफरा के खसरा नंबर 407/7 पर EWS वर्ग के लिए फ्लैट बनाए जाएंगे। लेकिन जब राजस्व अभिलेखों की जांच की गई तो पता चला कि जिस जमीन पर यह दावा किया गया है वह जमीन बिल्डर के नाम पर दर्ज ही नहीं है। इससे यह संदेह और गहरा गया है कि गरीबों के लिए आवास के नाम पर विभाग को झूठा शपथपत्र देकर विकास अनुज्ञा हासिल की गई।
एक ही दिन में 29 लेआउट मंजूर
जांच के दौरान एक और चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। बताया जाता है कि कुछ मामलों में एक ही दिन में 29 लेआउट फाइलों को मंजूरी दे दी गई। शहरी नियोजन से जुड़े इतनी बड़ी संख्या में लेआउट फाइलों को एक ही दिन में मंजूर करना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत लगभग असंभव है। इससे विभागीय स्तर पर मिलीभगत की आशंका और मजबूत हो जाती है।
करोड़ों के लेनदेन की आशंका
यदि इस पूरे मामले के आर्थिक पहलू को देखा जाए तो इसकी गंभीरता और बढ़ जाती है। नगर निगम के अनुमान के अनुसार एक एकड़ जमीन के रिहायशी लेआउट को स्वीकृति दिलाने में लगभग 75 हजार से 2.5 लाख रुपये तक का खर्च आता है। वहीं सामान्य मकान के नक्शे के लिए 8 हजार से 20 हजार रुपये तक शुल्क लिया जाता है। ऐसे में यदि शहर में 400 से अधिक नक्शे और 150 से ज्यादा लेआउट स्वीकृत किए गए हैं, तो इस पूरे खेल में करोड़ों रुपये के कथित लेनदेन की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने बिलासपुर के शहरी विकास तंत्र की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को गंभीर चुनौती दी है। सामाजिक संगठनों और नागरिकों के बीच भी इस मामले को लेकर चिंता बढ़ गई है। लोगों का कहना है कि यदि निर्माण स्वीकृति की प्रक्रिया में इतनी बड़ी अनियमितताएं संभव हैं, तो शहर में बन रही इमारतों की वैधानिकता और सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाएगी। यदि जांच में यह साबित होता है कि फर्जी दस्तावेजों और नियमों की अनदेखी कर मंजूरियां दी गईं, तो संबंधित बिल्डर और विभागीय अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग तेज हो सकती है। फिलहाल इस पूरे प्रकरण ने बिलासपुर के रियल एस्टेट सेक्टर और प्रशासनिक तंत्र में हलचल मचा दी है। शहर में चर्चा है कि यह मामला केवल एक परियोजना तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्षों से चल रहे एक बड़े नेटवर्क की ओर इशारा करता है। अब निगाहें प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं कि इस कथित नक्शा और लेआउट घोटाले में दोषियों की जवाबदेही तय होती है या नहीं।
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